आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने कुछ सैन्य कमांडरों, युद्ध में भाग लेने वालों, पवित्र प्रतिरक्षा के दौरान युद्ध में अपने शरीर का कोई अंग खोने वाले संघर्षकर्ताओं और कलाकारों से मुलाक़ात में पवित्र प्रतिरक्षा के काल को, दुनिया में वर्चस्ववादी व्यवस्था के प्रभाव काल में शक्ति के संतुलन की स्थिति को स्पष्ट करने वाला बताया और कहा कि प्रतिरक्षा काल के संघर्षकर्ताओं ने अपने संघर्ष से उस काल की पाश्विक, अत्याचारी और न्याय व अध्यात्म रहित दुनिया का सही चित्रण किया और यह चित्र दुनिया के लोगों को दिखानी चाहिए। उन्होंने अतिक्रमणकारी बासी शत्रु के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की असमान परिस्थितियों के कुछ नमूनों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि पवित्र प्रतिरक्षा के काल में ईरानी राष्ट्र को कंटीले तारों जैसी न्यूनतम संभावनाओं से लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जाती थी जबकि इसके मुक़ाबले में सद्दाम शासन को आधुनिकतम हथियार यहां तक कि रासायनिक हथियार भी दिए जाते थे।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने कहा कि आज रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का आरोप लगाने के लिए बड़ा हंगामा मचाया जाता है लेकिन इन्हीं पश्चिमी देशों ने इराक़ द्वारा थोपे गए युद्ध के दौरान सद्दाम शासन को रासायनिक हथियार दिए ताकि वह न केवल युद्ध के मोर्चों पर बल्कि सरदश्त जैसे शहरों में भी उन्हें इस्तेमाल करे। आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने फ़्रान्स व जर्मनी की ओर से सद्दाम शासन को रासायनिक हथियार दिए जाने की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि क्यों फ़्रान्स व जर्मनी के लोगों को यह न पता चले कि उनकी सरकारों ने उन आठ बरसों में ईरानी राष्ट्र के साथ क्या किया? आज दुनिया वर्चस्ववादी व्यवस्था की पारदर्शी और अपमानित करने वाली वह तस्वीर नहीं देख रही है जो ईरान के पास है।